एक बदनाम शायर “जॉन एलिया”

आज मैं बात करना चाहूंगा पाकिस्तान के मशहूर शायर जॉन एलिया के बारे में जॉन एलिया मूल रूप से अमरोहा के थे, वही अमरोहा जो आम और रोहों के लिए मशहूर है। जॉन एलिया खुदरंग शायर के रूप में जाने जाते हैं। एक ऐसे शायर जिसका रंग सिर्फ उन्हीं के पास है। मुशायरा में स्टेज पर सिगरेट सुलगाते हुए शायरी कहने की कला सिर्फ एक ही शख्स के पास थी वो थे जनाब जॉन एलिया, जिसे बदनाम शायर भी कहा गया। वैसे तो जॉन एलिया के बारे में कई मशहूर किस्से हैं लेकिन एक किस्सा तब का है जब जॉन ने ये शेर कहा कि मेरे कमरे का क्या बंया कि यहां खून थूंका गया है शरारत में… शेर के पीछे छोटी सी कहानी है जिसके बारे में मैं आज बताना चाहूंगा, जॉन एलिया कमाल अमरोही के भाई भी थे।

जॉन एलिया के कई किस्से थे लेकिन उस किस्से के बारे में बात करना चाहूंगा जिसकी वजह से मैंने आज जॉन एलिया जैसे बदनाम शायर को अपनी लेखनी में लाने की कोशिश की है। पाकिस्तान के किसी कॉलेज में मुशायरा था और जॉन साहब वहां मुख्य अतिथि थे, कॉलेज की जो प्रस्तोता थी उसकी एक सहेली टीबी के रोग से ग्रस्त थी। प्रस्तोता ने अपनी सहेली से कहा कि आज उर्दू के एक बड़े शायर जॉन एलिया साहब हमारे कॉलेज में आ रहे हैं, तुम चलना चाहोगी। रोग ग्रस्त लड़की ने सोचा जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं एक दिन शायरी के नाम ही कर लेते हैं… लड़की ने उद्घोष किया तो जनाब दिल थाम कर बैठिए क्योंकि आपके सामने एक मशहूर शायर जॉन एलिया साहब आ रहे हैं।

जॉन अपने पुराने अंदाज में मंच पर आए और शेर को उठाया लाजवाब जॉन साहब ने कहा कि रंग…लोगों को और जिज्ञासा हुई लोगों ने दिल थाम लिए वाकई आज की रात कयामत लाएगी। जॉन ने फिर मिसरा उठाया लोग वाह-वाह दाद देने लगे रंग हरे रंग में लोग जैसे मंच पर चढ़े जा रहे हैं। अचानक जॉन ने सिगरेट का आखिरी कश लेकर फेंकते हुए कहा छोड़ो यार और मंच से बिना शेर पूरा किये उतर गए। प्रस्तोता लड़की ने खूब समझाया प्लीज सर वो शेर पूरा कर दीजिए…जॉन साहब ने कहा बेवकूफ लड़की वह शेर पूरा है ही नहीं और अब  मेरा मूड भी नहीं है। यही किसी शायर, कवि और किसी लेखक की पहचान होती है उसके खुदरंग को दर्शाती है।

वह अपनी मर्जी पर ही लिखता और कहता हैं… मन करा तो लिखा नहीं तो बरसो कुछ नहीं लिखा। समय बीता और जॉन एलिया साहब को सुनने आई टीबी कि वह मरीज लड़की अपनी आखिरी सांसें गिन ने लगी और उस समय कॉलेज के प्रोग्राम की प्रस्तोता लड़की अपने हाथ में उसका हाथ लिए पूछ रही थी कि कोई आखिरी ख्वाहिश है तेरी तो बता…खून थूकतें हुए उस टीबी की मरीज लड़की ने कहा कि आखिरी के वक्त जॉन एलिया को बुला दो कुछ साल पहले उन्होंने एक शेर कहा था जो कि अधूरा था… मैं उसे पूरा सुनना चाहती हूं जॉन एलिया तक खबर पहुंची की एक लड़की है जो आपसे शदीद मोहबत करती हैं।  टीबी की मरीज है और आपसे आकर पर मिलना चाहती हैं। जॉन साहब ने सिगरेट सुलगाई फिर दृश्य बदला और मरीज लड़की ने जॉन साहब का हाथ पकड़कर पूछा जनाब आपको याद भी है आपने कुछ समय पहले कॉलेज के प्रोग्राम में एक मिसरा पड़ा था कि रंग हर रंग में है दाद तलब…जॉन साहब जैसे दिमाग पर जोर देकर याद करते हुए बोले हां हर रंग की अपनी महत्ता है। रंग की प्रशंसा की जा सकती है जितना महत्व सफेद रंग है उतना ही लाल रंग का भी या कि उतना ही काले रंग भी।

टीबी की मरीज लड़की ने कहा मैं इस मिसरे को पूरा करना चाहती हूं लेकिन उस टीबी की मरीज लड़की ने जैसे ही कुछ बोलना चाहा वैसे ही मुंह में खून भर आया और उसने मुंह में भरे खून को वहीं फर्श पर थूंक दिया। इधर जॉन साहब ने हिकायत से मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया तभी उस लड़की ने शेर पूरा किया कि जो खून थूंकू तो वाह -वाह कीजे… सच भी है खून का रंग भी तो लाल है या रंग भी तो दाद अलग हो सकता है। तो यारों मुकम्मल शेर यूं हुआ कि रंग हर रंग में है दाद तलब, खून थूंकू तो वाह वाह कीजे…तो ये थी जॉन एलिया के इस शेर के पीछे एक छोटी सी कहानी। हालांकि जॉन ने पाकिस्तान की जिस मशहूर डायरी लेखन जाहिदा हिना से निकाह किया बाद में उनसे उनका तलाक भी हो गया…एक बदनाम शायर थे जनाब जॉन एलिया..

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