बदलते दौर का बदलता जन्मदिन

जी हां बदलते दौर का जन्मदिन ऐसा इसलिए क्योंकि हर चीज की तरह जन्मदिन मनाने और उस दिन के होने का आयाम आज बदलता जा रहा हैं, ऐसा लग रहा हैं कि अब सिर्फ नाम के लिए जन्मदिन बचा हैं। दोस्तों सोच कर देखिए , याद कर के देखिए कि जब आप छोटे थे , तो किन-किन परिवेश में और किन – किन स्वरूप में कैसे -कैसे जन्मदिन मनाने थे। 24 घंटे के उस दिन का हर के क्षण में कुछ ना कुछ मतलब होता था। दिन की शुरूआत होती थी माता और पिता जी के चरण स्पर्श से। उसके बाद मंदिर जाकर भगवान के आर्शीवाद लेना। बात यहीं नही खत्म होती थी। शाम 4 बजे से ही यह तय होने लगता हैं कि शाम को क्या कपड़े पहनने है। कौन – कौन आएगा और क्या -क्या गिफ्ट लेकर आएगा और गिफ्ट भी कागज के गिफ्ट पेपर में पैक होकर मिलना अगल ही मजा था। उसके बाद बात आती हैं केक पर लगे मोमबत्ती की, दोस्तो मोमबत्ती भी गिनकर लगाई जाती थी । तो ये वो दिन थे जिन्हें हम अपने एक खास उम्र में महसूस किया हैं। लेकिन आज के परिवेश में सबकुछ बदल गया ना ही वो पैर छूने की परंपरा ही बची हैं और ना ही वो कागज वाले गिफ्ट पेपर बचे है। उससे ज्यादा दोस्तों वो अब अहसास भी नहीं हैं, ना हीं वो उमंग, लेकिन मैं क्या हर के वो लोग जो आज बड़े हो गए हैं कहीं ना कहीं उस क्षण को महसूस कर रहे होंगे। इस लेख के माध्यम से मैं कामना करूंगा की जीवन के किसी क्षण में कहीं फिर से वो दिन लौट कर एक बार वापर आए।

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